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Jan 18, 2012

"स्वप्न -सत्य"

देखा सुना
पढ़ा और जाना
अपने को फिर ,
अलग सा माना,
शब्दों के विश्लेषण में उलझे
वो प्रश्न पुराने कभी न सुलझे /
तुझे स्वयं से अलग ही पाया
सत्संगी बन जान न पाया /
नचिकेता ,सुकरात बनूँ में
तू तू है ,मै ही हूँ मै मै /
प्रवचनों से भी जान न पाया
गीता गीत समझ न पाया /
धीरे धीरे द्वार खुले फिर ,
शब्दों के जाले टूटे फिर /
और अचानक टूट गया भ्रम
उलझ विचारों का टुटा क्रम /
तू मैं का तो भ्रम ही पाला,
टूट गया वो पूर्वतन जाला/
जो तू है -वो ही तो मै हूँ
तू से अलग मै ही कब हूँ/
सो अहम, सो अहम भाव प्रकाशित ,
एक आदि शब्द से सब परिभाषित /
पूर्ण तुष्ट फिर स्वयं को पाया
स्वप्न -सत्य सा सब कुछ पाया //

1 comment:

prakriti said...

वाह मित्र! जितनी भी तारीफ करें कम है, भाषा के संस्कार, कल्पना की गहराई, अनुभव की पूर्णता, और मार्मिकता, मौलिक अलंकारों से सुशोभित है, आपकी रचना है नीरज जी ! हम आशा करते हैं अपनी इन अर्थ प्रदान करने वाली कवितावों के द्वारा, हम सब का मार्ग आप प्रकाशित करते रहेंगे आभार!

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