Jan 26, 2012

"ये गणतंत्र"

आ मनाएं ,
दिवस गण तंत्र ,
गण तो रूठा
भ्रष्ट हुआ तंत्र /
पार्टियाँ बदलते ,
वो बन गया मंत्री
परेडों से सलामी से
पद्म श्री ,पद्म विभूषण
भूला न गया आज भी
वो कारगिल का सन्तरी/
भ्रष्टाचार बना आचार,
लोक तंत्र का बना अचार/
इधर गुटबाजी ,उधर माफिया
नेता जिया ,सिर्फ धन के लिए जिया /

आ मनाएं ,
दिवस गण तंत्र ,
मान सरोवर ,कैलाश पर्वत
आधा कश्मीर औ पूरा तिब्बत ,
चीन पाक के कब्जे में परतंत्र ,
आ मनाएं ,
अपना ये गण तंत्र //

1 comment:

Mithilesh said...

मैने सभी रचनाओं को ध्यानपूर्वक पढ़ा. उसमें गोटा लगाया. कभी उनकी गहराइयों में समाया और कभी किनारे लग कर विश्राम भी पाया, थकन मिटने के लिए नहीं, विचार-मंथन के लिए. आनंद आया, शांति मिली और मन निर्मल हो गया.

भाव, मर्म, दर्द, लफ्ज, तड़प, अभिव्यक्ति, धर्म, कामना, मंशा, गुहार, अपनत्व, स्नेह, सोच और हर मासूम ख्वाब में लिपटी इन मर्मस्पर्शी अभियक्तियों के लिए साधुवाद...ज्ञापित करने के आलावा मेरे पास कुछ भी तो नहीं है....स्वस्ति......