Dec 1, 2012

प्राण प्रतिष्ठा

मौन हुआ तो अन्तः शक्ति 
बोल उठा तो अभिव्यक्ति /
नेत्र बंद फिर ध्यान लगाया 
कल्पित देव , मन में ध्याया /
पूज आराधन औ गुण गान 
यही सहज था वही महान /
यही ,यही तो मनुष्य भाव है 

पत्थर पूजें दिव्य भाव है /
मूर्ति बना यदि पूजा उसको 
माना देवता ,भाव शक्ति को /
हम चेतन अव्यक्त रूप थे
प्रेम प्रीति के ऊर्ज रूप थे /
जड़ता के प्रेमी बन बैठे
इस शरीर में व्यक्त हो उठे /
मानो इश्वर कवि जैसा है
ऊर्जस्वित वह रवि जैसा है
हम चैतन्य जड़ में स्थित
प्रेम प्रीति को करें विस्तरित /
जैसा स्रोत बने हम वैसे
ईश भाव की कविता जैसे //

5 comments:

Madan Mohan Saxena said...

शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन.
बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

Neeraj Tyagi said...

शुभ प्रभात ..धन्यवाद

प्रेम सरोवर said...

आपकी रचना बहुत अच्छी लगी। मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

Isha said...

हम चेतन अव्यक्त रूप थे
प्रेम प्रीति के ऊर्ज रूप थे /
जड़ता के प्रेमी बन बैठे
इस शरीर में व्यक्त हो उठे /sunder........

Neeraj Tyagi said...

dhayawad ...Ishajee, Prem jee aur Madan jee :-)