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Dec 1, 2012

प्राण प्रतिष्ठा

मौन हुआ तो अन्तः शक्ति 
बोल उठा तो अभिव्यक्ति /
नेत्र बंद फिर ध्यान लगाया 
कल्पित देव , मन में ध्याया /
पूज आराधन औ गुण गान 
यही सहज था वही महान /
यही ,यही तो मनुष्य भाव है 

पत्थर पूजें दिव्य भाव है /
मूर्ति बना यदि पूजा उसको 
माना देवता ,भाव शक्ति को /
हम चेतन अव्यक्त रूप थे
प्रेम प्रीति के ऊर्ज रूप थे /
जड़ता के प्रेमी बन बैठे
इस शरीर में व्यक्त हो उठे /
मानो इश्वर कवि जैसा है
ऊर्जस्वित वह रवि जैसा है
हम चैतन्य जड़ में स्थित
प्रेम प्रीति को करें विस्तरित /
जैसा स्रोत बने हम वैसे
ईश भाव की कविता जैसे //

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