Oct 25, 2016

हला हल

पल भर जीवन
अर्पित तन मन
स्वप्निल बादल
निराश दल दल //
       अब वही फिर वही पल
       पी चुका फिर हला हल
       रूह क्या ,तेरी या मेरी
       ज़ुदा नहीं ,नहीं विचलित//
हो चुके जो अब व्यतीत
वही वह बनाते अतीत
याद जैसे हो झरोंखे
द्रश्य फ़िर वह नए अनोखे //
          नये भाव स्मृति पटल पर
          नए गीत नयी कलम पर
          रात्रि सर्प कहीँ अद्रश्य
          तू ही तू तेरे ही द्रश्य //
चाँद रात  झूमते पलाश
मै औ तू निरभ्र आकाश
ध्यान किसका कौन लीन
मेँ औ तू बस अब विलीन //

3 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27-10-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2508 में दिया जाएगा ।
धन्यवाद

Madan Mohan Saxena said...


बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |


मंगलमय हो आपको दीपों का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

बढ़िया रचना !