जीते जी जिस माँ को तुमने
दो रोटी तक नहीं खिलाई,
मरने पर हलवा-पूरी देकर
कौन-सी सेवा निभाई?
जिस पिता को जीते जी तुम
घर में जगह नहीं देते,
मरने पर तस्वीर के आगे
फूल चढ़ाकर क्या देते?
जीते जी जो माँ-बाबू को
वृद्धाश्रम छोड़ आता है,
बाद में लाखों खर्च करे तो
क्या सचमुच पुण्य पाता है?
श्राद्ध नहीं बस पिंडदान है,
श्राद्ध नहीं बस कर्मकांड,
माता-पिता की सेवा करना
सबसे पावन पुण्य-प्रसाद।
जब तक साँसें चलती हैं,
तब तक उनका मान करो,
बाद की पूजा छोड़ो
पहले जीते जी सम्मान करो।
मरने के बाद कौन मिलेगा,
यह किसने देखा है?
माँ-बाप के चेहरे पर हँसता
स्वर्ग ही हमने देखा है।”
उस दिन घर के हर सदस्य ने
एक नया संकल्प लिया—
माँ-बाबूजी के रहते ही
उनका हर सुख अपना होगा,
जीते जी सम्मान मिलेगा,
यही हमारा श्राद्ध होगा। 🙏