10 सित॰ 2026

बीच खड़े,

 न कुछ पाने की चाह जिसे,

न कुछ खोने का डर 

वह निष्क्रिय है—उसका जीवन

जैसे ठहरा सागर 


जिसने अपने भीतर पाया

पूर्ण ब्रह्म का उजियारा,

उसके आगे कौन-सी मंज़िल,

किससे माँगे वह सहारा?


हम तो दोनों के बीच खड़े,

इच्छाओं के गाँव लिए,

कुछ सपनों की धूप लिए,

कुछ अपनों के नाम लिए।


रोटी की भी चाह हमें है,

अपनों का अधिकार लिए,

कंधों पर कुछ भार समय का,

दिल में भी कुछ प्यार लिए।


चाहत है तो पीड़ा भी है,

कर्तव्य है तो थकना है,

जीवन है तो गिरना भी है,

गिरकर फिर से उठना है।


न हम पूरे त्यागी हैं,

न पूर्ण ज्ञान हमारा है,

फिर भी इस अधूरेपन में

जीवन कितना प्यारा है।


हम तो दोनों के बीच खड़े,

कर्मों का संसार लिए,

कुछ सपनों की धूप लिए,

कुछ अपनों के नाम लिए।



निष्क्रियता में शून्य मिलेगा,

पूर्ण ज्ञान में मिले किनारा,

इन दोनों के बीच मनुष्य ही

लिखता अपना भाग्य सितारा।


हम तो दोनों के बीच खड़े,

जीवन का उपहार लिए,

कुछ सपनों की धूप लिए,

कुछ अपनों के नाम लिए।


1 सित॰ 2024

युग परिवर्तन करें पहरुए

  

युग परिवर्तन करें पहरुए,
कौन बचाए दीप सुनहरे?
नकारात्मकता में प्रेम कहाँ,
सड़कों पर रोष बिखरता,
संस्कृति, सभ्यता, राष्ट्र की सोच,
पूर्णमासी का चाँद निखरा,
सूर्य-रश्मि का ओज न भाता,
मीन-मेख हम खोजें हर क्षण,
नव षड्यंत्रों में रखें धीरज,
मिल-जुल फिर से ढूँढ़ें मंत्र,
मिलकर राष्ट्र सँवारें हम,
रही विषमता हारे वो जुए
घृणा बढ़ाए और घृणा को,
भीड़तंत्र में सत्य कहाँ?
आज़ादी यदि दोष खोजती,
उसमें फिर आदर्श कहाँ?
पोस्टर-पोस्टर क्रोध उभरता।
गाली में सुख, सत्य अखरता,
मन क्यों इतना विष से भरता?
उस भीड़ के लिए इनमें भी लोच।
अपने हित की बढ़ती होड़,
सामूहिक हित से मुँह क्यों मोड़?
फिर भी उसको कहने लगे बुरा।
चाँदनी तक आँखों को खलती,
कैसी दृष्टि हमारी हुई भला?
धूप का उजियारा चुभ जाता।
स्वार्थ में ओत-प्रोत मनों को,
हर प्रकाश पर दोष नज़र आता।
रोष बना अब जीवन-दर्शन।
कैसी सोच हुई है आज—
हर ओर दिखाई देता रोष ही रोष।
खिले, पल्लवित कीचड़ नीरज।
अब अँधियारे दीप जलाएँ,
सूने मन उजले स्वप्न जगाएँ।
श्रम-साम्य से सधे ये तंत्र।
मधुमक्खी के छत्ते-सा हो,
राष्ट्र हमारा—सुदृढ़, स्वतंत्र।
यही हमारा हो शुभ मंत्र।


12 नव॰ 2021

बस तार तार

 काल के प्रवाह में 

भूत भविष्य दाह में 

वर्तमान के सत्य 

असत्य हुए सब कथ्य ,

जुड़ती खंडित प्रतिमाएं 

आओ फिर से रोष जतायें //


सर्व जगत का केंद्र ये मैं 

आत्म शक्ति आधार ये मेँ 

मेँ ही कहता स्वयं को मेँ 

नहीं विलग तुझसे ये मेँ ,

क्षणिक आभासी अलगाव 

सदा रहा कल्पों से जुड़ाव //


वो रहस्य सा रुप बदलता 

भर्मित ज्ञान चर्चाएं करता 

कभी कभी जब लगा जीत सा 

पाया समर्पित रहा मीत सा ,

शब्द कीर्तन भजन गुंजार 

जिसे समझा ज्ञान ,बस तार तार //

28 फ़र॰ 2020

पत्थर सी राजनीति

ईमानदारी धर्म सद्भाव
ठेकेदारों ने खरीदे भाव
चढ़ गए सभी पर मुलम्मे
 हावी  हैं देखो राजनैतिक निकम्मे

न कोई दर्शन न सिद्धान्त
गरीबी अभाव से अभी भी क्लान्त
युवा चिल्लाते कहाँ रोज़गार
झंडे उठाते नारे लगाते बार बार

पत्थर सी राजनीति
पत्थर उठवाती है
देश भक्त  सीनों पर
गोली चलवाती है /
पंचतारा होटल में
देखो वो अय्याश
कितने ही घोटाले
न हुआ पर्दा फ़ाश /
विदेश भागेगा
मिलेगा उसे सकून
वो तोड़ती पत्थर
जलता रहेगा उसका खून /

हथियारों का व्यापारी
देखो एक हुई दुनिया सारी
कर लो सभाएं फोरम में चर्चाएँ
मुनाफ़ा कैसे हो नीति ये बनाएं //

वो तोड़ती पत्थर ,उठाती वज़न
उसे क्या पता क्या धर्म क्या वतन //
ये मुलम्मों  के ठेकेदार
करते रहे बस अनाचार
कहीं तो लगेगी दुकान ,बढ़ेगा व्यापार
गरीबों की जमीन पर लगेंगे फिर झंडे
जुलूसों में पड़ेंगे उन पर बस डण्डे //

आ धर्म खेलूं ,खेलूँ ईमानदारी
नये प्रतीकों से ,फलेगी ठेकेदारी
तिकड़मों के बाज़ार ,चीख़ता कामगार
नए नारे सजाता फिर वो ठेकेदार
कभी तो कोई इन्हें  फिर से जगा दे
विवेकानन्द के शब्द ------
"माँ मुझे मनुष्य बना दे "  //

9 फ़र॰ 2020

नव वर्ष

नव वर्ष
ज़िन्दगी का हर्ष
जो बीता सो बीता
सब कुछ कर लो रीता
नई सोच नई आकांक्षा
कर लो गहन मीमांसा
क्या पाया क्या खोया
कितने पलों को जिया
जीवन तो बस वही
तीव्रता हो छोटा ही सही
आओ फिर उड़ जाएं
नए काल मे फिर मुड़ जाएं
समय चक्र ये रुके न कभी
वो हुआ कभी जो है अभी
फिर भी वही तड़प चाव
बस दिखते रहे नए बदलाव
दिखते रहें दृश्य आभासी
कल अमावस आज पूर्णमासी
नवीन वर्ष में हो नया आल्हाद
जो कुछ मिला प्रभु धन्यवाद

8 मार्च 2019

बन जा आत्म घाती

वो नारों का शोर
अहंकार सी ख़ुशी
गैरत के नाम पर
बस कर लो ख़ुदकुशी //

आज़ादी के सपने
सियासत में भिगाये
मासूमों की  गुमराही
झूठी जन्नत दिखाए //

कमसिन नादान वो
पथ्थरों से खेलते
कौन है दोस्त दुश्मन
कभी न जानते //

बस पत्थर  उठायें
जन्नत को ढूंढते
काफिरों को मार
फ़ना की ही सोचते //

भोले नादान वो
ज़िन्दगी दांव लगाते
इंसानियत के दुश्मनों की
 साजिश न भांप  पाते //

हथियार का जखीरा
कोई तो मोल लेगा
हिन्दू या मुस्लिम
कोई तो लड़ेगा

वो गैरत के नाम पर
मासूमों को बरगलाते
जला न पाते  गरीब की  दिया बाती
बारूद बाँध बस बन जा  आत्म घाती //




 //



15 जुल॰ 2018

आई बरखा

आई बरखा
मस्ती  छलकी
मन मयूर मचला
 सुंदरी वो थिरकी/
बूंद बूंद फुहारें                        
बनी नरम चादर 
सूरज भी दुबका
बोल उठे दादुर/
बादल से मिले बादल
टकराए चमकें बिजली
भीग गए वस्त्र सब
मानस में उड़ती तितली/
आ नृत्य देख चंचल 
जा छोड़ सारे दलदल
मस्ती में थिरके भीगा तन
अब खूब मचले मेरा मन/"

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मै भारत का नेता हूँ  नेता नहीं अभिनेता हूँ  चमचे चिपकें जैसे गोंद  धोती नीचे हिलती तोंद // मेरी तोंद बढे हो मोटी  सारे चेले सेंक...