न कुछ पाने की चाह जिसे,
न कुछ खोने का डर
वह निष्क्रिय है—उसका जीवन
जैसे ठहरा सागर
जिसने अपने भीतर पाया
पूर्ण ब्रह्म का उजियारा,
उसके आगे कौन-सी मंज़िल,
किससे माँगे वह सहारा?
हम तो दोनों के बीच खड़े,
इच्छाओं के गाँव लिए,
कुछ सपनों की धूप लिए,
कुछ अपनों के नाम लिए।
रोटी की भी चाह हमें है,
अपनों का अधिकार लिए,
कंधों पर कुछ भार समय का,
दिल में भी कुछ प्यार लिए।
चाहत है तो पीड़ा भी है,
कर्तव्य है तो थकना है,
जीवन है तो गिरना भी है,
गिरकर फिर से उठना है।
न हम पूरे त्यागी हैं,
न पूर्ण ज्ञान हमारा है,
फिर भी इस अधूरेपन में
जीवन कितना प्यारा है।
हम तो दोनों के बीच खड़े,
कर्मों का संसार लिए,
कुछ सपनों की धूप लिए,
कुछ अपनों के नाम लिए।
निष्क्रियता में शून्य मिलेगा,
पूर्ण ज्ञान में मिले किनारा,
इन दोनों के बीच मनुष्य ही
लिखता अपना भाग्य सितारा।
हम तो दोनों के बीच खड़े,
जीवन का उपहार लिए,
कुछ सपनों की धूप लिए,
कुछ अपनों के नाम लिए।