25 नव॰ 2017

परोक्ष बुद्धि

समझ ,समझ से 
समझ को समझो 
समझ से समझना 
बड़ी बात है 

बुद्धि परायी 
काम न आयी 
स्वयं को जानो 
तभी बात है /

इधर उधर यदि 
व्यर्थ की बाते 
दिन हों व्यतीत 
फिर वही रात है /


किसने   बदला 
इस जगती को ?
स्वयं को बदला 
तभी  बात है /

25 अक्टू॰ 2016

हला हल

पल भर जीवन
अर्पित तन मन
स्वप्निल बादल
निराश दल दल //
       अब वही फिर वही पल
       पी चुका फिर हला हल
       रूह क्या ,तेरी या मेरी
       ज़ुदा नहीं ,नहीं विचलित//
हो चुके जो अब व्यतीत
वही वह बनाते अतीत
याद जैसे हो झरोंखे
द्रश्य फ़िर वह नए अनोखे //
          नये भाव स्मृति पटल पर
          नए गीत नयी कलम पर
          रात्रि सर्प कहीँ अद्रश्य
          तू ही तू तेरे ही द्रश्य //
चाँद रात  झूमते पलाश
मै औ तू निरभ्र आकाश
ध्यान किसका कौन लीन
मेँ औ तू बस अब विलीन //

5 जून 2016

कहाँ गया चाँद !

कहाँ हैं खग कहा हैं मृग
बस धुआँ उगलती गाड़ियां
बड़े शहरों की जग मग /
फूल भँवरे वो पर्वतों की श्रेणी
खो गयी कही वो नदियों की कल कल
जहाँ सुन्दरी गूँथती थी वेणी /
देखो उधर वो आग का गोला
जँगलों को निगलता बस  छोटा सा शोला /
कट रहे हैं जंगल हो रहे हैं भूस्खलन 
वृक्ष तो वृक्ष  पशु पक्षी भी  कम /
आखिर कब तक बस यही क्रम
मशीनों की भयानक खट खट में
खो गयी वो लताओं की वाटिका
कहाँ वो पुष्प पल्लवित
जहाँ कोयल की थी कूक                            
मानो मयूरों से नृत्य में
कहीं हो गयी चूक //
देखो डालियों के झुण्ड में
था बया का वो घोंसला
नोच ही डाला किसी ने
किसी शैतान सा था होंसला //
जंगल जंगल धुएँ के बादल
अब कही खो गयी वो शेर की मांद
छुप गया वो आसमां
दिखा न कब से
दादी का चाँद //

8 मार्च 2015

ये केंकड़े !

ना कुछ तेरे बस में ,

न कुछ मेरे बस में ,

सोये हुए लोगों की भी

क्या कोई व्यवस्था होती है ?

या उन्मादी रट्टू तोतों की ,

क्या कोई व्यवस्था होती है ?

हम अच्छे हैं ,वो बुरा है ,

मेने जो माना वो अच्छा है ,

में विराट हूँ ,तुम छोटे हो /

इन्ही सब ,इन्ही सबसंकरी गलियों में ,

प्रेम विहीन सपाट चेहरे ,

टोकरी में रखे ,

केकड़ों की तरह ,

एक दूसरे को  नीचे  ,

और नीचे खींच रहे हैं /

 

ये लंका के लोग !

सोचा ,लिखा ,कागज को बुरा लगा /
क्यूँ उसके ऊपर रोज़ ,कलम चलाता हूँ ,
सोच सोच कर ,लिख लिख कर ,
क्या कभी कुछ ,परिवर्तन हो पाया है ?
ये सोये हुए लोग ,
समृधि के कोहरे में /
लंका की प्रजा की तरह ,
पूजा पाठ में लगे हैं ,या फिर ,
सुरबालाओं और सूरा की मधुशाला के ,
नृत्य व संगीत में ,कहीं खो गए हैं /

17 मार्च 2014

फिर खेलो होली

जेब कतरों को देख फैल गया रोष 

भुनाया गया फिर आम आदमी का आक्रोश 

ना नीति या दर्शन

 ना चिंतन या मनन 

बस आक्रोश मे शोर 

उन्हे छोड बाकी सब चोर //

बजा चुनावों का डंका

 देश जैसे हो लंका 

चाहे जैसी होगी नीति 

मिटेगी ना कभी ये राजनीति /

खा लो प्रजातंत्र की रोटी साथ मे अचार

बस वही वह भ्रष्टाचार /

उन्होने खाया भरपेट अब तुम भी खा डालो ,

ये व्यवस्था रसीली थालीतुम भी खेलो चुनावों की होली /

चुने हुओं की लगेगी बोली 

रातों रात बदलेंगे टोली /

नये नये रंगों से फिर खेलो होली 

फिर खेलो होली //


30 सित॰ 2013

नया दृश्य

मैने ज्यों उछाला राष्ट्र  शब्द

छा गया सन्नाटा ,सब निशब्द

फिर बात की राष्ट्र प्रेम की

वहां बात हुई रास प्रेम की /

शब्द ईमान औ ईमानदारी भी उछाले

उन्हें लगी मूर्खता औ मुंह पे लगे ताले /

अरे वो श्रवण कुमार अब तो बस कांवरिया

डिस्को में नाचता , अब रात भर सांवरिया /

रिश्ते नातेदार निरे समय गंवाते ,

चचा ताऊ बक बक ,बहुत सर खाते /

कविता औ छंद अब लगें चप्पो लल्लो

सुनने दो शीला या बस छम्मक छल्लो /

अब जेब कतरों से पट गयी दिल्ली

देवी के जागरणों में भक्त पड़े टल्ली//

मदरसों आश्रमों में बढ़ता अनाचार 

धर्म धर्म नहीं ,धर्म अब व्यापार /

इन  सभी दृश्यों का ना अब कोई अंत 

सत्य जहाँ दिखता ऐसा न कोई पंथ /

भ्रष्ट हुए तंत्र अब भ्रष्ट सारे मंत्र //

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