दान वही जो हाथ न फैलें,
श्रम से जीवन महक उठे,
मन में सोया स्वाभिमान फिर,
आँखों में आकर चमके।
किसी दुखी के आँसू पोंछो,
उसका दर्द समझने को
उसके हाथों में हुनर भी दो,
कल का सूरज रचने को
मत देना बस इतनी खुशियाँ,
जो पल भर में फिर खो जाएँ,
ऐसा विश्वास जगाना उसमें,
विपदा में भी मुस्काएँ।
उपकारों की छाँव से बढ़कर,
आत्मबल का मान रहे,
हर मानव अपने श्रम से ही
हर मस्तक स्वाभिमान रहे।
किसी को इतना भी मत बाँधो,
तुम बिन वह फिर चल न सके,
इतना तो मजबूत बना दो
गिरकर फिर वह उठ भी सके।
यही प्रेम है, यही धर्म है,
यही मनुजता का संसार,
हाथ थाम कर छोड़ न देना,
जगना सिखलाओ बारंबार।
ऐसा संसार बनाना है,
जहाँ दया नहीं, अधिकार मिले,
हर हाथों को काम मिले और
हर जीवन को सम्मान मिले।
@*नीरज त्यागी*