12 अप्रैल 2012

रच पाओगे ?

अब यह  तुमने 
क्या  कह डाला 
इश्वर को "कल्पित "
कह डाला ?
सोचो -रचा 
उसीने तुमको /
क्यूँ भूले वह  
रचता सबको ?
तुम अब  रूप ही 
उस का रचते /
जैसा रचते 
वैसा बनते /
फिर  तुम हो 
अंश मात्र ही ,
रचना उसकी 
नाम मात्र ही /
उसको तो क्या 
रच पाओगे 
क्या अपने को 
रच पाओगे ?

26 मार्च 2012

ये परखा तो

कौन कहाँ कैसा है प्याला 
ये परखा तो कैसी हाला 
परख परख मत बुन ये जाला 
पंछी बन उड़ पंखों वाला 
प्रेम सुरा पी बन मतवाला  //

"मैं"गया किधर?

एक अजनबी अनजाना सा 
नयन मिल गए फिर जाना सा ,
बार बार क्यूँ दृष्टि  उधर ही 
हर दृष्टि "मैं"गया किधर ही !
मूक नयन जादू कर जाते 
दृष्टि प्रेम का रस भर जाते /
नयन नयन से क्यूँ लड़ जाते 
बिन साकी प्याला भर जाते /
आ प्रियतम अब इसको पी लें 
भंग सुरा बिन मस्ती जी लें //

18 मार्च 2012

बंदी आत्मा

न मूल्य न चरित्र ,न धारणा न धर्मं
बस आधिपत्य ,धनोपार्जन ही कर्म /
मैं और मेरा ,यहाँ वहां साम्राज्य
परिवार हुए समूह, राष्ट्र बने राज्य //
यही तो युगों युगों से स्वार्थ का सपना
जो हो चतुर धनी ,वही सिर्फ अपना //
ऊंचे घरोंदे ,वो पत्थरों की बुलंदी
माटी के पिंजरे ,वहीँ आत्मा बंदी //

15 मार्च 2012

दृश्य शक्ति

सूरज !
क्या कभी छिपता है ?
चाँद !
क्या कभी घटता है ?
ये तो हम हैं
और हमारी दृश्य शक्ति
उतना उजाला
जितनी शक्ति //

14 मार्च 2012

मैं

मैं लहर सा
एकत्र हुआ
व्यक्त हुआ
फिर विलीन
कहीं और
कोई और
किसी और
कला में
व्यक्त होने के लिए //

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