9 फ़र॰ 2020

नव वर्ष

नव वर्ष
ज़िन्दगी का हर्ष
जो बीता सो बीता
सब कुछ कर लो रीता
नई सोच नई आकांक्षा
कर लो गहन मीमांसा
क्या पाया क्या खोया
कितने पलों को जिया
जीवन तो बस वही
तीव्रता हो छोटा ही सही
आओ फिर उड़ जाएं
नए काल मे फिर मुड़ जाएं
समय चक्र ये रुके न कभी
वो हुआ कभी जो है अभी
फिर भी वही तड़प चाव
बस दिखते रहे नए बदलाव
दिखते रहें दृश्य आभासी
कल अमावस आज पूर्णमासी
नवीन वर्ष में हो नया आल्हाद
जो कुछ मिला प्रभु धन्यवाद

8 मार्च 2019

बन जा आत्म घाती

वो नारों का शोर
अहंकार सी ख़ुशी
गैरत के नाम पर
बस कर लो ख़ुदकुशी //

आज़ादी के सपने
सियासत में भिगाये
मासूमों की  गुमराही
झूठी जन्नत दिखाए //

कमसिन नादान वो
पथ्थरों से खेलते
कौन है दोस्त दुश्मन
कभी न जानते //

बस पत्थर  उठायें
जन्नत को ढूंढते
काफिरों को मार
फ़ना की ही सोचते //

भोले नादान वो
ज़िन्दगी दांव लगाते
इंसानियत के दुश्मनों की
 साजिश न भांप  पाते //

हथियार का जखीरा
कोई तो मोल लेगा
हिन्दू या मुस्लिम
कोई तो लड़ेगा

वो गैरत के नाम पर
मासूमों को बरगलाते
जला न पाते  गरीब की  दिया बाती
बारूद बाँध बस बन जा  आत्म घाती //




 //



15 जुल॰ 2018

आई बरखा

आई बरखा
मस्ती  छलकी
मन मयूर मचला
 सुंदरी वो थिरकी/
बूंद बूंद फुहारें                        
बनी नरम चादर 
सूरज भी दुबका
बोल उठे दादुर/
बादल से मिले बादल
टकराए चमकें बिजली
भीग गए वस्त्र सब
मानस में उड़ती तितली/
आ नृत्य देख चंचल 
जा छोड़ सारे दलदल
मस्ती में थिरके भीगा तन
अब खूब मचले मेरा मन/"

23 अप्रैल 2018

प्राण प्रतिष्ठा


 मौन हुआ तो अन्तः शक्ति

बोल उठा तो अभिव्यक्ति /

नेत्र बंद फिर ध्यान लगाया
कल्पित देव , मन में ध्याया /

पूज आराधन  गुण गान
यही सहज था वही महान /

यही ,यही तो मनुष्य भाव है
पत्थर पूजें दिव्य भाव है /

मूर्ति बना यदि पूजा उसको
माना देवता ,भाव शक्ति को /
हम चेतन अव्यक्त रूप थे
प्रेम प्रीति के ऊर्ज रूप थे /
जड़ता के प्रेमी बन बैठे
इस शरीर में व्यक्त हो उठे /

मानो इश्वर कवि जैसा है
ऊर्जस्वित वह रवि जैसा है/

हम चैतन्य जड़ में स्थित
प्रेम प्रीति को करें विस्तरित /

जैसा स्रोत बने हम वैसे


ईश भाव की कविता जैसे //

25 नव॰ 2017

परोक्ष बुद्धि

समझ ,समझ से 
समझ को समझो 
समझ से समझना 
बड़ी बात है 

बुद्धि परायी 
काम न आयी 
स्वयं को जानो 
तभी बात है /

इधर उधर यदि 
व्यर्थ की बाते 
दिन हों व्यतीत 
फिर वही रात है /


किसने   बदला 
इस जगती को ?
स्वयं को बदला 
तभी  बात है /

25 अक्टू॰ 2016

हला हल

पल भर जीवन
अर्पित तन मन
स्वप्निल बादल
निराश दल दल //
       अब वही फिर वही पल
       पी चुका फिर हला हल
       रूह क्या ,तेरी या मेरी
       ज़ुदा नहीं ,नहीं विचलित//
हो चुके जो अब व्यतीत
वही वह बनाते अतीत
याद जैसे हो झरोंखे
द्रश्य फ़िर वह नए अनोखे //
          नये भाव स्मृति पटल पर
          नए गीत नयी कलम पर
          रात्रि सर्प कहीँ अद्रश्य
          तू ही तू तेरे ही द्रश्य //
चाँद रात  झूमते पलाश
मै औ तू निरभ्र आकाश
ध्यान किसका कौन लीन
मेँ औ तू बस अब विलीन //

5 जून 2016

कहाँ गया चाँद !

कहाँ हैं खग कहा हैं मृग
बस धुआँ उगलती गाड़ियां
बड़े शहरों की जग मग /
फूल भँवरे वो पर्वतों की श्रेणी
खो गयी कही वो नदियों की कल कल
जहाँ सुन्दरी गूँथती थी वेणी /
देखो उधर वो आग का गोला
जँगलों को निगलता बस  छोटा सा शोला /
कट रहे हैं जंगल हो रहे हैं भूस्खलन 
वृक्ष तो वृक्ष  पशु पक्षी भी  कम /
आखिर कब तक बस यही क्रम
मशीनों की भयानक खट खट में
खो गयी वो लताओं की वाटिका
कहाँ वो पुष्प पल्लवित
जहाँ कोयल की थी कूक                            
मानो मयूरों से नृत्य में
कहीं हो गयी चूक //
देखो डालियों के झुण्ड में
था बया का वो घोंसला
नोच ही डाला किसी ने
किसी शैतान सा था होंसला //
जंगल जंगल धुएँ के बादल
अब कही खो गयी वो शेर की मांद
छुप गया वो आसमां
दिखा न कब से
दादी का चाँद //

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